

स्वामी श्री वीरब्रह्मेन्द्र
कालज्ञानम.....
अर्थात् मेरी जाति के विषय में कोई पूछे तो, कौओं के सदृश धूर्त एवम् दुष्ट लोगों को क्या कहकर समझाऊँ मेरी जाति के लग लोक गीत गाते हैं और अपने शीर्ष में स्थित प्रज्ञ होकर रहते हैं, योग शब्दावलि में सहस्त्रार तक पहुँच जाते हैं । मेरी जाति का उद्भव तब हुआ जब वह भौतिक लोक से सम्पर्क हुआ । शिव से सम्पृक्त है, ब्रह्मा से सम्पृक्त है । मेरी जाति त्रिमूर्तियों के मूल को जानती है । 'कुल' शब्द सम्प्रति ‘कुण्डलिनी शक्ति' का द्योतक है जो सर्प शक्ति है ।
(वीर ब्रह्मम के अत्यंत विश्वसनीय व परम भक्त सिद्दय्या कृतज्ञता पूर्वक यह मानते हैं कि जो कुछ थोड़ा बहुत वे जानते हैं, वह अपने श्रद्धेय गुरु के अनमोल प्रवचन की मात्र प्रतिध्वनि है । इसलिये उनकी अपनी रचनाएँ बहुत महत्वपूर्ण हैं, जिनसे वीरब्रह्मम के उच्च विचारों को समझा जा सकता हैअतएव इस संग्रह के अनुवाद में सिद्दय्या के गीतों को भी समुचित स्थान दिया गया है । निम्न लिखित गीत का उद्धरण सिद्ध करता है कि सिद्दय्या ने अपने गुरु के सिद्धांतों का बहुत प्रचार किया ।)
(तेलुगु) -
“पाद सेवकुड, पाद रक्षकुड : गुरु
पाद रेणुवुकु अर्हडनु
विन्न मात्रमुन चेप्प वच्चितिनि
अन्नलारा मीरु तेलियरय्या:
जाति नीतुलु जन्म मरणमुलु
ऊचि ऊचि जो कोट्टरय्या
वीर वाक्य मिदि दारा बोसिते
इन्नन्दु कोन्दरि कन्ददया ।”
अर्थात् चरणों का सेवक हूँ, गुरु चरणों का रक्ष हूँ । उनके चरण धूलि के योग्य हूँ । सुनते ही, कहने चले आया हूँ । भाइयो ! इसे समझो । धर्म व नीति, जन्म व मरण को हिला हिला कर थपकी दो गुरु के इस संदेश को उद्घोषित न करूं तो कुछ लोगों को छोड़कर, कहीं भी, किसी को भी समझने में नहीं आयेगा ।
पाण्डित्य व्यर्थ है - (तेलुगु) -
चदिविनन्दुकु मोक्ष साधनम्बेदि ?
चदुव कुण्डिन जनुलु साधिम्पलेरा ?
अर्थात् पाण्डित्य प्राप्ति के बाद क्या सभी लोगों ने मुक्ति प्राप्त की ? पर मोक्ष का साधन क्या है ? क्या अज्ञानी लोग उसे प्राप्त नहीं किया ?
(तेलुगु) -
“एन्नि जन्ममुलेत्ति, एन्नि तपमुलु चेसि
ईजन्म मेत्तितिनि, मनसा !
एन्निविधमुल नैन ईरुपमुन गुरुनि
एडबायकुण्डवे मनसा !
एन्निविधमुल नैन ईरूपमुन गुरुनि
एडबायकुण्डवे मनसा !
चदुवुलन्नियु चदिवि, सन्यासि मार्गमुन
सँचरिम्पग नेल मनसा !
चदुवुतो नुन्नटि सर्वम्बु देशिकुनि
सन्देहमुनु मानु मनसा !”
अर्थात् ओ मन ! कितने जन्मों को लेकर, कितना तप करके मैंने इस जन्म को पाया हे मेरे मन किसी भी तरह से हो, इस रूप में गुरु को मत छोड़ । हे मन ! तमाम विधाओं को प्राप्त करके भी, सन्यासी का मार्ग क्यों विचारता है ?
हे मन ! विद्या के साथ सब कुछ लेकर तू अपनी शंकाओं को त्याग दे ।
अध्यापक और अध्यापन - (तेलुगु) -
"गुरुवु शिष्युडाये, शिष्युडु गुरुवाये,
गुरुवु शिष्युल सन्दु गुरुतोक्कटाये:
गुरुवु शिष्युल सन्दु गुरुतुग तेलिसिते
एरुक निजमाये, मरि एमि लेदाये ।'
