स्वामी श्री वीरब्रह्मेन्द्र

कालज्ञानम.....

तीर्थ यात्रा - (तेलुगु) -

'काशिकि पोवलेना ? तीर्थमु
मोसुकु रावलेना ? ।। काशिकि ।।
काशि तीर्थमु कन्नुल नुन्नदि
बेसि कन्नु शिव काशिग नुन्नदि ।। काशिकि ।।

अर्थात् काशी क्यों जायें ? वहाँ से तीर्थ जल ढोकर क्यों लायें ? ।। काशी ।।
क्या काशी का तीर्थ-जल (पवित्र गङ्गाजल) तुम्हारे नेत्रों में नहीं है ? क्या तुम्हारी क्रुद्ध तिरछी आँखें शिव काशी नहीं है, जो शिर की तीसरी आँख सदृश है ? ।। तप काशी ।।

नैतिक पतन - (तेलुगु) -

"मनो निरंजन मैते, माट लेल मनकु ?
मनो निरंजन मैते, माट लेल एव्वरितो ?
कल्लु, भँगि, साराई तागि,
ओल्लु मरचि पडनेल नया ?
तिण्डिपोतु मुण्डल केल्लनु
तिरुपति यात्रा एलनया ?
पारुबोतु मुण्डल केल्लनु
पारमार्थिक मेल नया ?
हहुमीरि तिरिगे मुण्डकु
बुद्धि चेप्प मन केलनया
त्त गुरुवुल पादमु पट्टिते
उन्नति पोनेल नया ?

अर्थात् जब मन विकृत हो जाये तो हमें निरर्थक बातें करने की क्या आवश्यकता है ? जब मन कामासक्त हो जाये तो और किसी से बातें करने की क्या जरूरत है ?
सेन्धी, भाँग, दारू पीकर, बेसुध लुढ़क जाने की क्या जरूरत है ? लालची वेश्याओं को तिरुपति यात्रा क्यों ? भगोड़े व्यभिचारी और वेश्याओं को आध्यात्मिक ज्ञान क्यों ? निकम्मी और मर्यादा हीन इन औरतों को सीख देने की हमें क्या आवश्यकता ? ढोंगी गुरुओं के चरण छूने से रहा सहा ज्ञान भी लुप्त हो जायेगा ।

सच्चा रोष - (तेलुगु) -

नडिवीधि नामुन्दु नाटिन्तुरा कोल्मि !
नाडि माण्डलमन्दु चाटिन्तुरा !
सन्धि तेलियनट्टि बड्ड कुक्कल बट्टि !,
बन्धिञ्चि बाकुल कुम्मिन्तुरा !
शिव गोविन्द गोविन्द !
हरि गोविन्द गोविन्द !

अर्थात् सड़क के बीचो बीच में अपने सामने भट्टी लगाकर उन्हेंजीवित जलाऊँगा । इस नाड़ी मण्डल के सम्पूर्ण क्षेत्र में मैं उद्घोषित करूँगा । ज्ञान के साथ समझौता न करने वाले उन नीचे कुत्तों को पकड़कर, बाँधकर छुरी भोंक दूंगा । शिव गोविन्द गोविन्द ! हरि गोविन्द गोविन्द !

जाति-पाँति का भेदभाव - (तेलुगु) -

"एकुलमनि ननु विवरमडिगिते
एमनि तेलुपुदु लोकुलकू?
लोकुलकू - पलुगाकुलकू -
दुर्माणुलकू - ईदुष्टुलकू?
फाल भागमुन ईललु पाडुचु
भावमु गन्नदि ना कुलमु
मुट्टन बेरिगिन दीकुलमु
मुट्ठलो शिवुडु मुट्टलो ब्रह्मा
मुग्गुरु मूर्तुल मूलमु देलिसिन दीकुलमु ।'