

स्वामी श्री वीरब्रह्मेन्द्र
कालज्ञानम.....
अर्थात् गुरु, शिष्य हो गया और शिष्य गुरु । गुरु-शिष्य को समुचित रूप से समझा जाये तो उनकी पहचान अद्भुत हो जाती है । ज्ञान ही सत्य है शेष सभी माया है ।
राजयोगी - (तेलुगु) -
"सँसारमन्दु नुण्डियु
सँसारमु मिथ्य चेसि सर्वमु ताने,
सँसारम्बुनु गेलिचिन
सँसारे राज योगी सत्यमु सिद्धा !"
अर्थात् राजयोगी वही है जो गृहस्थ जीवन व्यतीत करता है । संसार को मानता है । वह सार्वभौम हो, गृहस्थ जीवन को जीतता है । जो लौकिक अस्तित्व का रूप है ।
योग का अभ्यास - (तेलुगु) -
"यज्ञमु चेसे सुजनुलकु
वेदोक्तपु विथि तेलियदया !
अग्र जन्म मैं नन्दुकु तनलो
अग्नि लेपि कूचुण्ड वलेन,
मुगुरिकि हितवुग मूल जन्म मुलु
फालमन्दु शोधिम्प वलेन ।'
फालमन्दु शोधिम्प वलेन ।' अर्थात् यज्ञ करन वाले ज्ञानियों को भी, वेदोक्त विधि नहीं ज्ञात है । उच्च वर्ण में जन्में हैं तो अपने में योगस्थ अग्नि को प्रदीप्त करके बैठना चाहिए तीनों के हित के लिए, मूल जन्मों को शीर्ष में खोजना चाहिए अर्थात् ज्ञानियों को
चाहिए कि योग साधना के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति को प्रदीप्त करें ।
(तेलुगु) -
“वूदि वूदि पोय्युदेटप्पुडु
ऊपिरि समरु नेरुग वलेन
काम क्रोध मनु पशुवुनु पट्टि
कर्म द्वारमुन कट्ट वलेन ।।"
अर्थात् फूंक फूंक कर, चूल्हा फूंकते समय श्वास के संघर्ष को जानना चाहिए । काम क्रोध रूपी पशु को बाँधकर कर्म द्वार पर बँधना चाहिए । अर्थात् स्वर योग के द्वारा इडा, पिंगला और सुषुम्न के स्त्रोत को जानना चाहिए । यम, नियम आदि से मनोविकार और क्रोध के पशु को कर्म द्वार पर बाँध देना चाहिए ।
(तेलुगु) -
"ऊदेतित्तुल पैगानुण्डे
उन्मति तेलियर ओरन्ना !
तित्तुल नडुमनु चक्षुलं मीदनु
चीकटि गोट्टरा ओरन्ना !
चीकटि गोट्टनु तोक नालुक
तीसुक लेपरा ओरन्ना !
तोसुक लेपिते काककु पामु
चिढून लेचुर ओरन्ना !
अर्थात् हे भाई ! दोनों नाड़ियों के ऊपर तुम्हारी जो शक्ति विद्यमान हो गई है, उसको पहचानो ! दोनों नाड़ियों के बीच नेत्रों के ऊपर व्याप्त अँधेरे को दूर करो, जिसके लिए कुण्डलिनी शक्ति रूपी सर्प के सिर और पूँछ को पकड़कर उसे सीधा खड़ा करो । योगाभ्यास से जब अतिशय शक्ति उत्पन्न होगी, तब कुण्डलिनी शक्ति ऊपर की ओर तत्काल अग्रसर होगी ।
