स्वामी श्री वीरब्रह्मेन्द्र

कालज्ञानम.....

भक्ति मदि निल्प वलेनु जीवन्
मुक्ति मार्गुम तानु मुन्देरुग वलेनु ।। आनन्द ।।
अक्षरात्मकुडु कावलेनु -मूडु
अक्षरमुल भावमदि तेलियवलेन ।। आनन्द ।।
दीक्षाधिकारी गावलेनु - जन्मा
मोक्षा काँक्षनु गुरुनि पूजिम्प वलेनु ।आनन्द ।
निद्रा राकड तेलियवलेनु - पैनि
भद्रमुगनु योग निद्र पोवलेनु ।। आनन्द ।।
चिद्रुप मपुडे कनवलेनु - भद्रा
मुद्र कीलेरिगि सद्गति पोन्द वलेनु ।। आनन्द ।।
वेशा भाषलु मानवलेनु - तानु
दूषिञ्चिन वारि भूषिञ्च वलेनु ।। आनन्द ।।
चूपु मनसोकटि चेयवलेनु - सर्व
व्यापकुडगु चिन्मयत्मु गानवलेनु ।। आनन्द ।।
मेडमीदिकि जेरवलेनु - अचट
जोडु बायका हँस गूडागावलेनु ।। आनन्द ।।

अर्थात् यह तुम जानो कि अपनी अपराजेय इच्छा से आनन्दपूर्ण होकर तुम परम शक्ति पाओगे, जिसे तुमने पहचाना है । वासना रहित पूर्ण श्रद्धा और प्रेम से सद्गुरु के शरण में जाओ और काम और इच्छा को दूर करो, अष्ट कुञ्जर मद को विनष्ट करो । अपने मस्तिष्क में अनन्त सूक्ष्म को जानो कि क्रोध और कुण्ठा जो तामसी गुण हैं, उनसे अपने को मुक्त करो । इस अनन्त स्य को धारण करो । इस नश्वर काया के मोह को त्यागो । अपने जीवन काल में ही, मन में भक्ति को स्थिर करो, मुक्ति मार्ग को जानो अक्षर त्रय के अर्थ को पहचानकर तुम अनश्वर आत्मा बन जाओ । पूर्ण निष्ठा के साथ मुक्ति के लिए सत् गुरु की उपासना करने का प्रतिबद्ध अधिकारी बनो । भौतिक निद्रा को जानो, जागरूक होकर योग निद्रा में ही प्रवेश करो । उस योग निद्रा में ही उस पूर्ण ज्ञान, जिसे चिद्रूप कहते हैं, को पहचानो । भद्रमुद्रा के रहस्य को जानकर सच्चे भक्त की सद्गति को प्राप्त करो। स्वाँग और वेश, वाचालता का त्याग करो । जो तुम्हारा अपमान करता है, उसका सम्मान करो । मन और दृष्टि को एक करके उस सर्व व्यापी चिन्मय स्वरूप परमब्रह्म को पहचानो । शरीर रूपी भवन के उच्च भाग में अर्थात् सहस्त्रार में पहुँचकर परम हँस अर्थात् परमेश्वर में अनन्तकाल तक लीन हो जाओ ।

निक्षिप्त रहस्य - (तेलुगु) -

                                    ईश्वरम्मा जी द्वारा स्मरण पत्र,

ईश्वरम्मा वीरब्रह्मम जी की पौत्री, जो अक्षत योगिनी थी, हमें वीरब्रह्मम के महामंत्र का स्मरण कराती हैं और भक्ति-श्रद्धा के साथ निरंतर अभ्यास करने को कहती हैं

(तेलुगु) -

"भक्ति गलिगि मानसम्बुन मंत्रमु
मानका नडपण्डन्नाडु;
मंत्र तंत्रमुलु माया गादु-इक
मर्मम्बिदि यिन अन्नाडु;
तेलिसिन भक्तुलु तेलियनि वारिकि
ज्ञानमु तेलुपण्डन्नाडु;
रेयि पगलु मा द्वादशाक्षरी
मंत्रमु नडपण्डन्नाडु ।”

अर्थात् वीरब्रह्मम ने कहा था- “मन में भक्ति सहित मंत्र का जाप करो । मंत्र-तंत्र माया नहीं है, इसका रहस्य यह है जो भक्त जानते हैं, उन्हें चाहिए कि अज्ञानियों को ज्ञान के बारे में समझायें । रात दिन हमारे द्वादशाक्षर मंत्र का जप करते रहो ।”

(बारह मिथकीय प्रतीकों से बने मंत्र का निरंतर अभ्यास करना चाहिए)

परम आत्मा - (संस्कृत)-

      अनादि गते वेदान्ते कलिमल कलुषे
                        ज्ञाने सदा चरति
      वीरब्रह्माभिदय समज्ञानी लोकेहि
                        शङ्करम् तेज; ।।
                  (डॉ. पुट्टपति नारायण)

अर्थात् जब मानव समाज उपनिषदों के गूढ़ अर्थों को जानने में असमर्थ हुआ और अंधकार में निरंतर भटकने लगा तथा कलियुग के कारण उसका मन दूषित होने लगा, तब इस पृथ्वी पर वीरब्रह्मम के नाम से परम शिव की शक्ति अवतरित हुई ।