

स्वामी श्री वीरब्रह्मेन्द्र
कालज्ञानम.....
दो भविष्य वाणियाँ - (तेलुगु)
"चेप्प लेदण्टनक पोय्येरु ! नरुलार गुरुनी
चेरि मोक्किते ब्रतक नेर्चेरु ।
चेप्पलेदण्टनक पोय्येरु
तप्पदिदिगो गुरुनिवाक्यमु
तप्पु दोवल पोवु वारिनि
चप्परिची मिंगु शक्तुलु ।।"
अर्थात् लोगो ! फिर शिकायत नहीं करना कि मैंने तुम्हें भविष्य के बारे में सचेत नहीं किया । यदि तुम गुरु के पास करबद्ध जाओगे, तो इस संसार में जीने की कला जान जाओगे । यह गुरुवचन निश्चित होकर रहेगा जो गलत रास्ते पर चलेंगे, वे निश्चित ही धरती की शक्तियों के शिकार हो जायेंगे । अत: मुझसे फिर शिकायत नहीं करना कि मैंने तुम्हें सावधान नहीं किया ।
तेलुगु) -
“मोप्पेतनमुन मोस पोयेरु ! इदिगाक कोन्दरु
गोप्पतनमुन गोसु मीरेरु !
इप्पु डप्पु डनग रादु !
एप्पुडो एवेलनोमरि
गुप्प गुप्पुन दाटि पोयेडि
गुर्रपडुगुलु एरुपडुनु ।'' ।। चेप्प ।।
अर्थात् हॉय ! मूर्ख लोग बुरी तरह से धोखा खायेंगे और आगे तथाकथित कुछ महान लोग दूसरों पर मिथ्या लाँछन से दोषारोपण करेंगे, परन्तु वह छल कपट ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा । कोई समय सारिणी नहीं है । किसी भी समय, किसी भी घड़ी, उछलते कूदते, अद्भुत घोड़े के खतरनाक पद चिह्न दिखाई देंगे । फिर शिकायत नहीं करना कि मैंने तुम्हें इसकी कोई सूचना नहीं दी।
मूर्ति पूजा - (तेलुगु) -
“चिल्लर राल्लुक मोक्कुतुवुण्टे
चित्तमु चेडुनुर वोरे वोरे
चित्तमु लोपलि चिन्मय जोतिनि
चूचु चुण्डुटदि सरे सरे ।"
अर्थात् हे अज्ञानी और अबोध लोगो ! सुनो ! तुम निरर्थक पत्थरों की पूजा मत करो । उससे तुम्हारी बुद्धि बिगड़ जायेगी । यदि तुम मन के भीतर ज्ञान के प्रदीप्त प्रकाश पर अपनी दृष्टि को एकाग्र कर सकोगे, तो तुम्हारा भला ही भला होगा।
एक गृहस्थ का जीवन :
एमिटिकण्ट पनिकिरानि देमिटिकण्ट ?
मनकुगानि देमिटिकण्ट ? एमिटिकण्ट ?
मरेमिलेदण्ड - - - - - -
पामुचेरिन इण्ट पण्डने भयमण्ट ! ।। एमिटिकण्ट ।।
'आलुन्नदण्ट मोन नीकनुकूल कादण्ट
आलुण्टे नेमण्ट आलि मूर्ख रालण्ट
कालुनि दूतण्ट कष्ट पेट्टनण्ट ।एमिटि ।।
मोगुडुन्नदण्ट ! आलिमीद ममत लेदण्ट
मोगुडुण्टे नेमण्ट, मोगिलाकु सममण्ट !
एगदीस्ते यातनण्ट ! दिगदीस्ते तेलिवण्ट ।" ।। एमिटि कण्ट ।।
अर्थात् ओह ! वह किसलिये हैं ? जो व्यर्थ है, वह किसलिये ? जो हमारे काम की नहीं, वह किसलिये ? किसलिये ? और कुछ नहीं.... जिस घर में काम रूपी विषैला साँप प्ररेश किया हुआ हो, उस घर में सोना खतरे से खाली नहीं है। ।। किसलिये है ।।
पत्नी है, किन्तु तुम्हारे अनुकूल नहीं है, पत्नी रही तो क्या प्रयोजन ? पत्नी तो मूर्ख है, वह तो यम की धूत है, कष्ट दायिका है । ।किसलिये ।
पति है ! पत्नी पर अनुराग नहीं । पति है तो क्या प्रयोजन ? केवडे के पत्ते के जैसा । ऊपर उठायें तो परेशानी है और नीचे खींचे तो बुद्धि मानी है । ।। किसलिये ।।
