

स्वामी श्री वीरब्रह्मेन्द्र
कालज्ञानम.....
अचल मतम् - (तेलुगु) -
“ब्रह्मनग बेरे परदेशमुन लेडु
ब्रह्ममनग चूडु बट्टबयलु
तनकु ताने ब्रह्म तारक मौनया !
कालिकाम्ब हम्स कालिकाम्बा ।''
अर्थात् ‘ब्रह्म' जो परम शक्ति है, वह कहीं दूसरी जगह नहीं है । ‘ब्रह्म' को देखना हो तो, खुले अनन्त में देखो । ‘ब्रह्म' उस मुक्ति प्रदान करने वाला मिथकीय शब्द तारक में दिखाई देगा । हे कालिकाम्बा ! हँस कालिकाम्बा, तू सत्य का संरक्षक और दुष्टों का संहारक है ।
निर्विकल्प समाधि - (तेलुगु) -
"मायनु नरिकिनवाडु गुरु
रायनितो जत गूडु
पायुचु विषयमु, रोयुचु तत्वमु
एयेड चुचिन एकमु तानै ।। मायनु ।।
कुण्डलिनिटु भेदिचि
अखण्डमुगनु भाविंचि
अण्ड पिण्ड ब्रह्माण्डमुल तट
निण्डि पण्डि या निर्विकल्पमुन'' ।। मायनु ।।
अर्थात् जो माया जाल को काट सकता है, वही गुरु श्रेष्ठ से जुड़ सकता है, विषय वासनाओं से घृणा करता है, उनसे दूर रहता है, जहाँ कहीं परम तत्व को देखता है, उसे आत्मसात कर लेता है, वहीं सांसारिक माया जाल को काटने वाला ही गुरु श्रेष्ठ से जुड़ सकता है । कुण्डलिनी शक्ति को भेद करके जो अपने को अखण्ड मानता है, अण्ड, पिण्ड और सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त उस निर्विकल्प, पूर्ण मानसिक शान्ति को प्राप्त करता है, वही माया जाल को काटकर गुरु श्रेष्ठ से जुड़ सकता है।
कुण्डलिनी महायोग - (तेलुगु) -
शिव पञ्चाक्षरि मन्त्रम परम शिव योगुलके जपसूत्रमअविरल योगम्बन्दिना वारिकि मीदने चिद्रूपम् ।। शिव ।।
ऐदु मुखम्बुल पेरिगिनदी ऐदाक्षरमुल अमरिनदी
ऐदैदुलु इरुवदि ऐदव अखण्ड तेजम्बी मन्त्रम ।। शिव ।।
मूडु त्रोवलदि साकारम मूडिटि मीदने श्रीकारम
चूचेदन्तयु साकारम चूपुनिलिपिते निराकारम ।शिव ।
सुषुम्नान्तमुन गुरुतेजम अष्ट कमलमुन शिवरूपम
सहस्त्रारमुन परब्रह्मा श्रीगुरु वीरेशुनि घन तेजम ।। शिव
अर्थात् शिव पञ्चाक्षरी मंत्र केवल शिवयोगियों के लिए जप सूत्र है ।
निरन्तर योगस्थ साधकों को शरीर के अन्दर निहित षट् चक्रों के पर ज्ञान के रूप में परमात्मा के दर्शन होते हैं । पाँच अक्षरों से संपृक्त यह मंत्र पाँच मुखों से विकसित होता है । पाँच-पाँच, अर्थात् पच्चीस होने से इसका तेज अखण्ड हो जाता है । परम शक्ति तीन माध्यमों से साकार होता है । तीनों के बीच ही श्री होता है । जो कुछ भी बाह्य रूप से द्रष्टव्य है, वह साकार है और यदि दृष्टि को एकाग्र कर सके तो वह निराकार हो जाता है । सुषुम्ना नाड़ी के अंत में परम शक्ति के प्रवाह की नाड़ी, गुरु तेज की चमक होती है। आठ पंखुड़ियों के कमल में अद्वितीय शिव का रूप स्थित है । सहस्त्रारा में परमब्रह्म के रूप में वीर गुरु के महान तेजस का प्रकाशन होता है
अनन्त ब्रह्मानन्द - (तेलुगु) -
आनन्दमयुडु गावलेनु-पूनि
तानु तानै युन्न ताउ गनवलेनु ।। आनन्द ।।
काममुनु कडकोट्ट वलेनु-अष्ट
सामजम्मुल मदमु समयिम्प वलेनु ।। आनन्द ।।
प्रेम सद्गुरु जेरवलेनु-दुष्ट
तामसपु दुर्गुनमु तोलगिम्प वलेनु ।। आनन्द ।।
सत्यमे मदि निल्पवलेनु
असत्य देहमु मीद आशवीडवलेनु ।। आनन्द ।।
